युद्ध में पुरुषों और लड़कों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा: छिपे हुए पीड़ितों की पहचान और चुप्पी तोड़ने की ज़रूरत
युद्ध और हिंसक टकरावों में पुरुषों व लड़कों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा क्यों दर्ज नहीं हो पाती और पीड़ितों को न्याय कैसे मिले?
युद्ध और हिंसक टकरावों में पुरुषों और लड़कों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा (Conflict-Related Sexual Violence—CRSV) एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखा मानवाधिकार संकट है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार यूक्रेन, सूडान, डीआर काँगो, ग़ाज़ा, सीरिया और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में पुरुष पीड़ितों के मामले सामने आए हैं। सामाजिक कलंक, भय और पुरुषत्व से जुड़ी धारणाओं के कारण अधिकांश मामले दर्ज नहीं हो पाते। जानिए युद्धकालीन यौन हिंसा, हिरासत में होने वाले अत्याचार, पीड़ितों की पहचान, कानूनी न्याय और मनोसामाजिक सहायता की आवश्यकता।
संयुक्त राष्ट्र समाचार की इस खबर में जानिए -
- युद्ध में पुरुषों के खिलाफ यौन हिंसा क्या है?
- युद्ध और हिंसक टकरावों में पुरुषों के साथ यौन हिंसा क्यों होती है?
- पुरुष यौन हिंसा के मामले दर्ज क्यों नहीं कराते?
- संयुक्त राष्ट्र युद्धकालीन यौन हिंसा के बारे में क्या कहता है?
- यूक्रेन में युद्धबंदियों के साथ किस तरह की यौन हिंसा हुई?
- युद्ध में यौन हिंसा के पीड़ितों को क्या सहायता मिलती है?
- पुरुषों और लड़कों के यौन हिंसा के पीड़ितों की पहचान क्यों जरूरी है?
- CRSV पीड़ितों को न्याय और पुनर्वास कैसे मिलते हैं?
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| Why do men experience sexual violence in war and violent conflicts? |
युद्ध में पुरुषों व लड़कों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा: चुप्पी तोड़ना ज़रूरी
24 अगस्त 2026 क़ानून और अपराध रोकथाम
युद्ध एवं हिंसक टकरावों के दौरान आम नागरिकों और हिरासत में रखे गए लोगों के साथ गम्भीर दुर्व्यवहार हो सकता है. ऐसे अपराधों को दर्ज करना ही काफ़ी नहीं है; यह सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है कि हर पीड़ित की पहचान हो, उसे संरक्षण मिले और वह न्याय व ज़रूरी सहायता तक पहुँच सके.
2025 में यूक्रेन के एक युद्धबन्दी को तीन साल की हिरासत के बाद रिहा किया गया. उनके ज़ेहन में बलात्कार, जबरन निर्वस्त्र किए जाने, मारपीट और जननांगों पर बिजली के झटके दिए जाने की भयावह यादें थीं.
उनका अनुभव उन अनेक मामलों की झलक देता है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र दुनिया भर में युद्ध और हिंसक टकरावों के दौरान दर्ज कर रहा है. पुरुषों और लड़कों को भी हिंसक टकराव से जुड़ी यौन हिंसा (CRSV) का शिकार बनाया जाता है. ऐसे मामले अक्सर हिरासत केन्द्रों जैसी जगहों पर होते हैं, जहाँ यौन दुर्व्यवहार को दर्ज करना मुश्किल होता है.
इस तरह की यौन हिंसा का सबसे अधिक शिकार महिलाएँ और लड़कियाँ होती हैं. लेकिन पुरुष पीड़ितों को अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है, जिससे उन्हें ज़रूरी चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक और क़ानूनी सहायता नहीं मिल पाती.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में हिंसक टकराव से जुड़ी यौन हिंसा के सत्यापित मामलों में 93 प्रतिशत भुक्तभोगी महिलाएँ और लड़कियाँ थीं, जबकि सात प्रतिशत पुरुष और लड़के थे.
लेकिन ये आँकड़े समस्या की वास्तविक व्यापकता को नहीं दर्शाते, क्योंकि बहुत से मामले कभी सामने ही नहीं आते. अनुमानों के अनुसार, युद्ध और हिंसक टकरावों के दौरान पुरुषों व लड़कों के ख़िलाफ़ होने वाले 90 से 95 प्रतिशत यौन दुर्व्यवहार के मामले दर्ज नहीं हो पाते.
हिरासत के दौरान क्या होता है?
हिरासत उन परिस्थितियों में शामिल है, जहाँ इस तरह की यौन हिंसा के मामले सबसे अधिक सामने आते हैं. यूक्रेन में संयुक्त राष्ट्र ने हिंसक टकराव से जुड़ी यौन हिंसा (CRSV) के 310 मामलों की पुष्टि की, जिनमें 280 भुक्तभोगी पुरुष थे. इनमें से कई युद्धबंदी या हिरासत में रखे गए आम नागरिक थे.
इन मामलों में बलात्कार, जबरन निर्वस्त्र करना, मारपीट और बिजली के झटके देना शामिल था. इन तरीक़ों का इस्तेमाल लोगों को दंडित और अपमानित करने, तथा उनसे अहम जानकारी या स्वीकारोक्ति हासिल करने के लिए किया गया.
यह समस्या केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं है. संयुक्त राष्ट्र ने कई अन्य युद्ध और हिंसक टकरावों में भी पुरुष पीड़ितों के मामले दर्ज किए हैं. यूएन के अनुसार, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि असुरक्षा, सीमित पहुँच और बदले की कार्रवाई के डर से बहुत से पीड़ित सामने नहीं आ पाते.
ये अपराध सामने क्यों नहीं आ पाते?
संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण अनुसंधान संस्थान (UNIDIR) के अध्ययनों के अनुसार, पुरुषत्व से जुड़ी सामाजिक धारणाएँ, समलैंगिकता को लेकर पूर्वाग्रह, कमज़ोर समझे जाने का डर और पुरुष पीड़ितों पर संस्थागत स्तर पर कम ध्यान, ऐसे मामलों के सामने न आने की प्रमुख वजहें हैं.
मामलों को किस तरह बताया जाता है, उससे भी उनकी पहचान पर असर पड़ सकता है. महासचिव की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुष और लड़के, ख़ासतौर पर हिरासत के बाद, अपने साथ हुई यौन हिंसा को अक्सर यातना के रूप में बयान करते हैं.
इस वजह से मानवतावादी एवं न्याय व्यवस्था के लिए हिंसक टकराव से जुड़ी यौन हिंसा (CRSV) के पीड़ितों की विशेष ज़रूरतों को पहचानना मुश्किल हो सकता है.
पूर्वी डीआर काँगो में हुए शोध से भी पुरुषों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के उस स्तर का पता चलता है, जो अक्सर सामने नहीं आ पाता. एक अध्ययन में सीधे पूछे जाने पर 23.6 प्रतिशत पुरुषों ने बताया कि वे यौन हिंसा का शिकार हुए थे. इनमें लगभग दो-तिहाई ने कहा कि यह हिंसा युद्ध या हिंसक टकराव के दौरान हुई थी.
पीड़ितों के सामने केवल संस्थागत बाधाएँ ही नहीं होतीं. समुदाय-आधारित पहलें भी उन्हें उबरने में अहम मदद दे सकती हैं.
एक संयुक्त राष्ट्र समर्थित नैटवर्क के ज़रिए अन्य पीड़ितों से जुड़ने के अपने अनुभव को साझा करते हुए, यूक्रेन के एक भुक्तभोगी ने कहा, “लम्बे समय तक मुझे लगा कि मेरे साथ जो हुआ, उसके बारे में बात करने की कोई जगह नहीं है. यहाँ ऐसे लोगों के बीच आकर, जो मेरी बात समझते हैं, सब कुछ बदल गया. इससे मुझे आगे बढ़ने का रास्ता मिला.”
कुछ अहम तथ्य
ऐसे मामले सामने क्यों नहीं आते?
सामाजिक कलंक, डर और शोध व सहायता सेवाओं की कमी के कारण कई मामले सामने नहीं आ पाते. रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध और हिंसक टकरावों में पुरुषों एवं लड़कों को अक्सर यौन हिंसा के सम्भावित भुक्तभोगियों के रूप में नहीं देखा जाता. इसी वजह से उनके ख़िलाफ़ होने वाली यौन हिंसा के अनेक मामले दर्ज नहीं हो पाते.
ऐसे मामले कहाँ सामने आए हैं?
युद्ध और हिंसक टकराव में यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन, ग़ाज़ा और पश्चिमी तट, सूडान, डीआर काँगो, लीबिया, सीरिया, यमन और हेती समेत कई जगहों पर ऐसे मामलों की पुष्टि हुई है.
पहचान क्यों ज़रूरी है?
भुक्तभोगियों की पहचान ज़रूरी है, ताकि उन्हें सही देखभाल, क़ानूनी सहायता और अन्य ज़रूरी मदद मिल सके.
संयुक्त राष्ट्र क्या कर रहा है?
संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाएँ भुक्तभोगियों की बेहतर पहचान, अग्रिम मोर्चे पर काम करने वाले पेशेवरों को प्रशिक्षण और भुक्तभोगी-केन्द्रित सेवाओं व सहायता नैटवर्क को मज़बूत करने के लिए काम कर रही हैं.
सहायता किस तरह की होती है?
भुक्तभोगियों की पहचान उन्हें उन ज़रूरी सेवाओं और सहायता तक पहुँचने में मदद करती है, जो उन्हें अन्यथा नहीं मिल पातीं.
UNIDIR ने बेहतर डेटा संग्रह की सिफ़ारिश की है, ताकि पुरुष और लड़के भी अपने साथ हुई यौन हिंसा के बारे में खुलकर बता सकें. साथ ही, पीड़ितों की भागेदारी बढ़ाने और उनकी ज़रूरतों के अनुरूप मनोसामाजिक सहायता उपलब्ध कराने पर भी ज़ोर दिया गया है.
UN Action नेटवर्क इन प्रयासों को आगे बढ़ा रहा है. यूक्रेन में ‘भुक्तभोगियों को सशक्त बनाने के लिए संयुक्त कार्रवाई’ (UNited Action to Empower Survivors) परियोजना के तहत 2025 में 160 पीड़ितों को मनोवैज्ञानिक परामर्श, पुनर्वास और उनकी ज़रूरतों के अनुसार सहायता दी गई, जिनमें 69 पुरुष थे. परियोजना ने पुरुष भुक्तभोगियों के ऐसे नैटवर्क बनाने में भी मदद की, जहाँ वे एक-दूसरे को सहयोग दे सकें और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा सकें.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने ज़ोर दिया है कि सभी पीड़ितों के अनुभव और ज़रूरतें एक जैसी नहीं होतीं. इसलिए सहायता देते समय उनकी उम्र, लिंग, परिस्थितियों और व्यक्तिगत ज़रूरतों को ध्यान में रखना ज़रूरी है.
सूडान में संयुक्त राष्ट्र समर्थित पहलों के तहत यौन हिंसा से प्रभावित पुरुषों एवं लड़कों के अनुभवों पर खुलकर बातचीत के लिए जगह बनाने की कोशिश की गई है. वहीं, UNHCR ने शरणार्थी और विस्थापन की परिस्थितियों में पुरुष पीड़ितों की मदद करने वाले राहतकर्मियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं.
चुप्पी तोड़ना क्यों ज़रूरी है?
आज भी हिंसक टकराव से जुड़ी यौन हिंसा (CRSV) से महिलाएँ एवं लड़कियाँ सबसे अधिक व असमान रूप से प्रभावित होती हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है, “यौन हिंसा हर व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार और पूरी मानवता की सामूहिक शान्ति व सुरक्षा के लिए ख़तरा है.”
लेकिन युद्ध और हिंसक टकरावों में पुरुषों और लड़कों को भी यौन हिंसा के पीड़ितों के रूप में पहचानने का मतलब अन्य असुरक्षित समूहों से ध्यान हटाना नहीं है.
इससे सहायता व्यवस्था की एक अहम कमी दूर होती है और यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि जिन भुक्तभोगियों की अक्सर अनदेखी होती है, उनकी पहचान हो, उनकी बात सुनी जाए तथा उन्हें ज़रूरी सहायता मिल सके.



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