महिला हिंसा घर का मामला नहीं है: उत्तराखंड के एक गांव से चुप्पी और सच की रिपोर्ट

हम औरतों की बहुत इज्जत करते हैं: दावों और हकीकत के बीच गांव

जखेड़ा गांव में लैंगिक हिंसा: खामोशी क्यों बोलती है?
शिक्षा, शराब और पितृसत्ता: हिंसा के सामाजिक कारण
जब महिलाओं पर हिंसा दिखती है, पर स्वीकार नहीं की जाती
महिलाओं की गवाही: रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हिंसा का डर
व्यवस्था की विफलता: हेल्पलाइन से लेकर पुलिस तक
ग्रामीण भारत में घरेलू हिंसा: आंकड़ों से आगे की सच्चाई
उत्तराखंड में महिला हिंसा: शांत पहाड़ों के भीतर असुरक्षा

क्या ‘घर का मामला’ कहकर न्याय टाला जा सकता है?

उत्तराखंड के जखेड़ा गांव से ग्राउंड रिपोर्ट: महिला हिंसा, सामाजिक चुप्पी, शिक्षा की कमी और व्यवस्था की विफलता पर एक गंभीर विश्लेषण...
Violence against women is not a private family matter: A report on silence and truth from a village in Uttarakhand.
Violence against women is not a private family matter: A report on silence and truth from a village in Uttarakhand.



घर का मामला नहीं होता है महिला हिंसा

“हम औरतों की बहुत इज्जत करते हैं।” जखेड़ा गांव में यह वाक्य कई बार सुनने को मिला। पुरुषों के लिए यह एक सामान्य वाक्य था, लेकिन महिलाओं की खामोशी इसके बिल्कुल उलट कहानी कह रही थी। बातचीत के दौरान जैसे ही शारीरिक हिंसा का विषय आया, महिलाओं के शब्द रुक गए और आवाज़ धीमी हो गई। जैसे वह इस शब्द का अर्थ अच्छे से समझ रही हों, लेकिन समाज का डर उन्हें इस पर बात करने से रोक रहा था।

महिलाओं पर लैंगिक हिंसा (Sexual violence against women)



उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक के जखेड़ा गांव में जब मैंने महिलाओं से लैंगिक हिंसा पर बात की तो शुरुआत में उन्होंने कहा कि “थोड़ी-बहुत होती है”, लेकिन उनके चेहरे और हावभाव बता रहे थे कि सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा गहरी है। वे खुलकर बात करने से डर रही थीं। वहीं जब पुरुषों से इस विषय पर सवाल किया गया, तो उनका जवाब लगभग एक-सा था “हम अपनी औरतों की बहुत इज़्ज़त करते हैं, उन्हें पूरी आज़ादी दी है।”

इस विषय पर मैंने करीब छह परिवारों से बातचीत की, लेकिन शारीरिक हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो यह विषय गांव वालों के लिए असहज कर देना वाला हो, जिस पर सवाल उठाना अनुचित है।

पहाड़ी क्षेत्रों से घिरे इस गांव की आबादी लगभग 600 है। आर्थिक रूप से कमजोर यह गांव शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत अधिक समृद्ध नहीं है। गांव की अधिकतर आबादी कृषि पर निर्भर है। सरकारी सेवा में उपस्थिति लगभग नगण्य है। खेती- किसानी के अलावा अधिकतर युवा सेना में कार्यरत हैं, वहीं 12 वीं के बाद अधिकांश लड़कियों की शादी कर दी जाती है। ऐसे में उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक इस गांव की बहुत कम लड़कियां पहुंच पाती हैं। बालिका शिक्षा की कम दर ही लैंगिक हिंसा को उभरने का मौका देती है।

अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर हिम्मत करके एक महिला ने बताया कि कुछ माह पहले उनके गांव में एक महिला के साथ गंभीर शारीरिक हिंसा हुई थी। महिला का पति शराब पीकर घर आया और उसने अपनी पत्नी को बुरी तरह मारा, जिससे उसकी आँख के नीचे गंभीर चोट आई थी। इस हिंसा के बाद वह महिला अपने मायके चली गई। यह घटना गांव के कई लोगों को पता थी, लेकिन इस पर खुलकर चर्चा किसी ने भी नहीं की।

जखेड़ा गांव में बातचीत से यह भी महसूस हुआ कि सामान्य समस्याओं पर तो लोग खुलकर बातचीत करते हैं, समाधान खोजने का प्रयास करते हैं, लेकिन जैसे ही बात महिलाओं पर होने वाली हिंसा की आती है, या तो खामोशी छा जाती है या फिर इसे स्वीकार करने से ही इंकार कर देते हैं। जाहिर है कि यह इंकार पुरुषों की तरफ से आया था। लेकिन महिलाओं की खामोशी सच को बयां करने के लिए काफी था। शायद उनकी इस चुप्पी के पीछे जागरूकता की कमी, सामाजिक दबाव और बदनामी का डर होगा।

35 वर्षीय एक महिला हर्षिता देवी (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “हमने अपने आसपास शराब के नशे में पुरुषों द्वारा महिलाओं को मारते देखा है। कभी घर वालों के सामने तो कभी बच्चों के सामने ही पति को पत्नी पर हाथ उठाते हुए देखा है।” उनका यह बयान बताता है कि हिंसा कोई छुपी हुई घटना नहीं है, बल्कि यहां की महिलाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है, बस पुरुष समाज द्वारा उस पर पर्दा डाल दिया गया है।

इसी तरह सुनीता देवी (बदला हुआ नाम) की कहानी और भी डरावनी है। उनका पति राजू (बदला हुआ नाम) शराब पीकर उन्हें मारता था और बच्चों के साथ भी हिंसा करता था। उनके दो बच्चे हैं एक सात साल का और दूसरा पाँच साल का। एक दिन उनके पति ने उन्हें और बच्चों को घर से निकाल दिया। वे दो दिन तक लापता रहीं। पति ने पुलिस में केस किया, लेकिन तब भी पत्नी का कोई पता नहीं चला। बाद में यह पता चला कि वे बागेश्वर में किसी रिश्तेदार के यहां शरण लिए हुए हैं। सुनीता देवी ने हेल्पलाइन पर कई बार मदद के लिए फोन भी किया, लेकिन उन्हें वहां से भी कोई ठोस सहायता नहीं मिली।

हालात इतने बदतर हो गए कि एक दिन वह खुद की जान लेने के इरादे से अपने बच्चों को लेकर नदी की ओर जाने लगीं। सौभाग्य से एक रिश्तेदार ने समय रहते उन्हें रोक लिया। इस पूरे मामले में यह पता चला कि उनका पति पहले भी मारपीट के मामले में जेल जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद उसके व्यवहार में कोई सुधार नहीं आया। यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता की कहानी है, जहाँ हिंसा झेल रही महिला को समय पर सुरक्षा और सहयोग नहीं मिल दे पाता है।

अगर हम इन अनुभवों को व्यापक संदर्भ में देखें, तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल घरेलू हिंसा के हजारों केस दर्ज होते हैं। देशभर में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या चार लाख से अधिक है। यह वह आंकड़े हैं जो रिपोर्टों में दर्ज होते हैं, जबकि अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को घर का मामला बता कर दर्ज किया ही नहीं जाता है।

उत्तराखंड में लैंगिक हिंसा

उत्तराखंड जैसे शांत और पहाड़ी राज्य की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यहां दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और यौन अपराधों के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य में हर साल सैकड़ों ऐसे मामले सामने आते हैं, जो बताते हैं कि प्राकृतिक सुंदरता के बीच भी महिलाओं की ज़िंदगी सुरक्षित नहीं कही जा सकती है। इन आंकड़ों और जमीनी अनुभवों को जोड़कर देखें, तो यह साफ होता है कि समस्या कानून की कमी की नहीं, बल्कि कार्यान्वयन, सामाजिक सोच और चुप्पी की संस्कृति की है। जब तक हिंसा को “घर का मामला” कहकर टाल दिया जाएगा, तब तक महिलाएं न्याय और सुरक्षा से दूर ही रहेंगी।

सवाल उठता है कि क्या महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए, अपने सम्मान के लिए और अपनी सुरक्षा के लिए खुद खड़े होने का पूरा मौका मिलता है? और सबसे अहम सवाल क्या हमारे समाज में महिलाएं कभी सच में हिंसा मुक्त जीवन जी पाएंगी?

जिया कर्मियाल
बागेश्वर, उत्तराखंड
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)
गाँव की आवाज़


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Amalendu Upadhyaya
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।

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