एआई के दौर में कितने प्रासंगिक रह जाएँगे कर्मचारी? रोज़गार, शिक्षा और मानवाधिकारों की वैश्विक चुनौती
एआई और रोज़गार: अवसर बनाम जोखिम
- शिक्षा क्यों है एआई-आधारित भविष्य की बुनियाद
- क्या अब मशीनें इंसानों की जगह ले लेंगी?
- एआई तक असमान पहुँच और बढ़ती सामाजिक खाई
- मानवाधिकार का प्रश्न और एआई की नैतिक सीमाएँ
एआई के लिए वैश्विक सहमति क्यों ज़रूरी है
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तेज़ी से वैश्विक अर्थव्यवस्था, श्रम बाज़ार और सामाजिक ढाँचों को बदल रही है। एक ओर जहाँ इसे उत्पादकता और नवाचार का माध्यम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कारण रोज़गार के अवसरों में गिरावट, कौशल-असमानता और सामाजिक-आर्थिक विभाजन के गहराने की आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं।
यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के शब्दों में, “मानवता का भविष्य किसी एल्गोरिदम के ब्लैक बॉक्स पर नहीं छोड़ा जा सकता।”
यह लेख एआई के दौर में कर्मचारियों की प्रासंगिकता, शिक्षा की भूमिका, बदलते रोज़गार स्वरूप, मानवाधिकारों की चुनौतियों और एआई के भविष्य को लेकर वैश्विक सहमति की ज़रूरत का विश्लेषण करता है। पढ़िए संयुक्त राष्ट्र समाचार की यह खबर...
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| How relevant will employees remain in the age of AI? The global challenge of employment, education, and human rights. |
एआई के दौर में कितने प्रासंगिक रह जाएँगे कर्मचारी?
आर्थिक विकास
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), आने वाले समय में समाज और अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव लाने की क्षमता रखती है, लेकिन इसके साथ रोज़गार अवसरों में गिरावट आने और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के और अधिक गहराने का जोखिम भी जुड़ा हुआ है. इसके मद्देनज़र, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि परिवर्तन की इस प्रक्रिया को किस तरह से ज़िम्मेदार ढंग से आगे बढ़ाया जाए, ताकि एआई के लाभ उसके जोखिमों पर भारी पड़ें.
एआई को लेकर चाहे कोई आशावादी हो या आशंकित, यह सत्य है कि एआई तेज़ी से हमारे निजी और पेशेवर जीवन के हर हिस्से में प्रवेश कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र लम्बे समय से एआई के विषय में ‘व्यक्तियों को प्राथमिकता’ देने वाले दृष्टिकोण का समर्थन करता रहा है.
वर्ष 2024 में, यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद को चेतावनी देते हुए कहा था कि मानवता का भविष्य कभी भी किसी एल्गोरिदम के “ब्लैक बॉक्स” पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए.
उन्होंने ज़ोर दिया था कि एआई आधारित निर्णयों पर हमेशा मनुष्यों का नियंत्रण और निगरानी बनी रहनी चाहिए, ताकि मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके.
इसके बाद से, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली वैश्विक स्तर पर एआई की नैतिक और दायित्वपूर्ण संचालन व्यवस्था को मज़बूत करने की दिशा में अपने प्रयासों को एकजुट कर रही है.
यह कार्य, ऐतिहासिक ‘ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट’ में शामिल दिशानिर्देशों और सिफ़ारिशों के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र ने, एआई-आधारित भविष्य के लिए शिक्षा को सबसे अहम बुनियाद क़रार दिया है.
यूएन के अनुसार, यह केवल शिक्षा व्यवस्था में एआई उपकरण जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है कि छात्र और शिक्षक, दोनों एआई-साक्षर हों.
1. शिक्षा की अहम भूमिका
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) में शिक्षा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी और एआई मामलों की प्रमुख शफ़ीका आईज़ैक्स ने कहा कि वर्ष 2030 तक वैश्विक शिक्षा प्रणाली को लगभग 4.4 करोड़ शिक्षकों की ज़रूरत होगी.
उन्होंने आगाह किया कि शिक्षकों में निवेश की जगह केवल एआई तकनीकों में निवेश को प्राथमिकता देना एक गम्भीर भूल होगी.
यूनेस्को अधिकारी के अनुसार, एआई भले ही डेटा के आदान-प्रदान में मदद कर सकता है, लेकिन वह मानवीय विकास का विकल्प नहीं बन सकता.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि शिक्षा मूल रूप से एक सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक अनुभव है, न कि केवल किसी तकनीकी प्रणाली के ज़रिये दी जाने वाली जानकारी.
2. बदलाव को अपनाना ज़रूरी
एआई के दौर में रोज़गार खोने की आशंका के बीच, संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाएँ श्रम बाज़ार में आ रहे बदलावों को अपनाने की अपील कर रही हैं.
विश्व आर्थिका मंच (WEF) के एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025 में क़रीब 41 प्रतिशत नियोक्ताओं (employers) की योजना थी कि एआई के कारण अपने कार्यबल में कटौती की जाए. हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि एआई के साथ-साथ नए तरह के रोज़गार भी उभरेंगे, जिनमें मशीनों की क्षमताओं और इनसानी कौशल का संयोजन होगा.
भले ही मशीनें, पैटर्न पहचानने और दोहराए जाने वाले कार्यों में सक्षम हों, लेकिन रचनात्मकता, निर्णय-क्षमता, नैतिक विवेक और जटिल मानवीय सम्बन्धों जैसे क्षेत्रों में इनसानी भूमिका बनी रहेगी.
अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने अपने साझीदारों के साथ किए गए अध्ययन में कहा है कि एआई के कारण हर 4 में से 1 रोज़गार का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सम्बन्धित रोज़गार समाप्त ही हो जाएँगें.
रिपोर्ट के अनुसार, कार्य करने के तरीक़ों में बड़े बदलाव तय हैं और ऐसे में कर्मचारियों पर यह ज़िम्मेदारी होगी कि वे लगातार नए कौशल सीखें, प्रशिक्षण लेते रहें और कामकाज के बदलते माहौल के प्रति स्वयं को अनुकूल बनाएँ.
3. सभी के लिए उपलब्ध हो एआई
कुछ चुनिन्दा बड़ी तकनीकी कम्पनियाँ, एआई से जुड़े शोध और नए टूल्स के विकास पर केन्द्रित हैं.
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि यदि एआई तक पहुँच को व्यापक नहीं बनाया गया, तो देशों के बीच और समाज के भीतर असमानता और अधिक गहराने का ख़तरा है.
यूएन द्वारा तैयार की गई रणनीतियों में इस बात पर बल दिया गया है कि शिक्षा, अर्थव्यवस्था और शासन से जुड़ी नीतियाँ ऐसी हों, जिनसे एआई के लाभ केवल विशेषाधिकार प्राप्त या तकनीकी रूप से उन्नत वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के व्यापक तबकों तक पहुँच सकें.
4. मानवाधिकारों को प्राथमिकता
संयुक्त राष्ट्र ने अनेक बार दोहराया है कि एआई का विकास मानवाधिकारों, मानवीय गरिमा और समावेशिता के अनुरूप होना चाहिए. संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि स्वचालन (automation) को बिना पर्याप्त निगरानी के विकसित किया गया, तो इसके दूरगामी सामाजिक दुष्परिणाम हो सकते हैं.
यूनेस्को ने, वैश्विक विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श के बाद वर्ष 2021 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक पहलुओं पर सिफ़ारिशें जारी की थीं.
इस दस्तावेज़ में स्पष्ट कहा गया है कि मानवाधिकार कोई वैकल्पिक सिद्धान्त नहीं हैं, और उन्हें टिकाऊ व ज़िम्मेदार एआई प्रणालियों के लिए अनिवार्य आधार बनाना होगा.
इस दस्तावेज़ में यह भी कहा गया है कि जो एआई उपकरण मानवीय गरिमा, समानता या स्वतंत्रता के लिए ख़तरा उत्पन्न करते हैं, उन्हें सीमित या प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए.
साथ ही, देशों की सरकारों से इन मानकों के लिए प्रभावी नियामन व्यवस्था और उसके सख़्त अनुपालन को सुनिश्चित करने की अपील की गई है.
5. एआई के भविष्य पर सहमति ज़रूरी
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, एआई से जुड़े जोखिमों और अवसरों से निपटना किसी एक सरकार, निजी क्षेत्र या नागरिक समाज के बस की बात नहीं है. इसके लिए व्यापक अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत है.
संगठन का कहना है कि एआई के सुरक्षित और ज़िम्मेदार प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक स्तर पर संचालन व्यवस्था तय की जानी आवश्यक है. इसके लिए, नैतिक मानकों पर सम्वाद, समन्वय के लिए यूएन समर्थित मंचों का गठन तथा सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच साझेदारियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.
इन साझेदारियों का उद्देश्य शिक्षा, कौशल विकास और कार्यबल के प्रशिक्षण में निवेश को मज़बूत करना है, ताकि एआई से होने वाले बदलावों के लिए दुनिया भर के लोगों को बेहतर रूप से तैयार किया जा सके.


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