डावोस 2026: गरम वैश्विक सियासत के बीच ऊर्जा और जलवायु बहस ने बदला एजेंडा
डावोस में दुनिया की सियासत गरम, लेकिन ऊर्जा (Energy) और जलवायु पर बहस (climate) ने बदला एजेंडा
- डावोस में जुटी दुनिया: भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच 65 राष्ट्राध्यक्ष
- A Spirit of Dialogue’: संवाद का नैरेटिव या दिशा बदलने की कोशिश?
- ऊर्जा सुरक्षा बनाम भू-राजनीति (geopolitics): ईरान, वेनेज़ुएला और आपूर्ति का संकट
- जीवाश्म ईंधन बनाम स्वच्छ ऊर्जा: बाज़ार ने राजनीति से आगे कदम बढ़ाया
- इलेक्ट्रिसिटी एरा की शुरुआत: सोलर और विंड क्यों बने सबसे सस्ते विकल्प
- चीन की निर्णायक भूमिका: नवीकरणीय ऊर्जा में वैश्विक नेतृत्व का दावा
- ऊर्जा संक्रमण की सबसे बड़ी बाधा: फंडिंग गैप और 1.5 डिग्री का लक्ष्य
- डावोस में ‘ईयर ऑफ वॉटर’: जल, ऊर्जा और जलवायु का गहराता संकट
डावोस 2026 का संदेश: राजनीति चाहे बदले, ऊर्जा का भविष्य बिजली ही है
डावोस 2026 में भू-राजनीतिक तनाव के बीच ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु संकट और स्वच्छ ऊर्जा ने वैश्विक एजेंडा बदल दिया। भविष्य बिजली का है...
स्विट्ज़रलैंड के डावोस में शुरू हुआ वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम 2026 (The World Economic Forum 2026 has begun in Davos, Switzerland.) इस बार सिर्फ़ ग्लोबल एलीट की सालाना मुलाक़ात नहीं है। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब दुनिया एक साथ कई मोर्चों पर अस्थिरता झेल रही है। अमेरिका की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर बयानबाज़ी, वेनेज़ुएला में राजनीतिक उथल पुथल, ईरान को लेकर बढ़ती चिंता और वित्तीय बाज़ारों में बेचैनी। इन सबके बीच डावोस में लगभग 65 राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख इकट्ठा हुए हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डेर लेयेन, जर्मनी के चांसलर फ़्रीडरिख़ मर्ज़ और चीन के उप प्रधानमंत्री हे लिफ़ेंग जैसे नाम इस बैठक को खास बना रहे हैं।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम 2026 की थीम
इस साल वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की थीम है “A Spirit of Dialogue”। लेकिन ऊर्जा और जलवायु पर चर्चा सुनकर साफ़ लगता है कि संवाद अब सिर्फ़ नैरेटिव का नहीं, दिशा का है। एक तरफ़ अमेरिका की ओर से जीवाश्म ईंधन को बढ़ावा देने वाले संकेत हैं। दूसरी तरफ़ डावोस के मंचों पर यह स्वीकार किया जा रहा है कि स्वच्छ ऊर्जा की रफ़्तार अब पलटी नहीं जा सकती।
जलवायु बहस के केंद्र में ऊर्जा सुरक्षा
ऊर्जा सुरक्षा इस बार जलवायु बहस के केंद्र (Energy security is at the heart of the climate debate.) में है। ईरान और वेनेज़ुएला जैसे देशों से जुड़े भू राजनीतिक जोखिमों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ऊर्जा आयात पर निर्भरता कितनी ख़तरनाक हो सकती है। इसी वजह से डावोस में बार बार यह बात उभर रही है कि घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिफ़िकेशन और मज़बूत ग्रिड ही असली सुरक्षा कवच हैं।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के कई सत्र इस बात पर केंद्रित हैं कि कैसे दुनिया “इलेक्ट्रिसिटी एरा” में प्रवेश कर चुकी है। रिन्यूएबल एनर्जी की लागत लगातार गिर रही है। सोलर और विंड अब सिर्फ़ जलवायु समाधान नहीं, बल्कि सबसे सस्ता और तेज़ विकल्प बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे अमेरिका का राजनीतिक रुख़ कुछ भी हो, बाज़ार की दिशा बदल चुकी है। स्वच्छ ऊर्जा में निवेश अब नैतिकता नहीं, प्रतिस्पर्धा और मुनाफ़े का सवाल बन गया है।
चीन इस बहस में एक निर्णायक भूमिका में दिख रहा है। डावोस में अपने संबोधन में चीन के उप प्रधानमंत्री हे लिफ़ेंग ने दो टूक कहा कि चीन नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन मैन्युफ़ैक्चरिंग में वैश्विक नेतृत्व को और मज़बूत करेगा। चीन पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा सोलर और विंड बाज़ार है। डावोस में यह बात बार बार दोहराई गई कि अगर चीन अपनी मौजूदा रफ़्तार बनाए रखता है, तो वैश्विक ऊर्जा संक्रमण और तेज़ होगा।
क्लाइमेट के नज़रिए से एक और अहम मुद्दा रहा वित्त
डावोस के सत्रों में माना गया कि ऊर्जा संक्रमण के लिए पैसा तो है, लेकिन वह सही जगह तक नहीं पहुँच रहा। ग्रिड, स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन और क्लीन फ़्यूल्स जैसे क्षेत्रों में निवेश की भारी ज़रूरत है। कई वक्ताओं ने चेतावनी दी कि अगर यह फंडिंग गैप नहीं भरा गया, तो 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य काग़ज़ों तक सिमट कर रह जाएगा।
इस साल डावोस में पानी को भी खास जगह मिली है। “ईयर ऑफ़ वॉटर” (Year of Water) के तहत यह बताया जा रहा है कि जल संकट, ऊर्जा और जलवायु आपस में गहराई से जुड़े हैं। हाइड्रोपावर, कूलिंग सिस्टम और कृषि सब कुछ पानी पर निर्भर है। बदलते मौसम में यह संकट ऊर्जा संक्रमण (Energy transition) को और जटिल बना सकता है।
कुल मिलाकर डावोस 2026 की तस्वीर साफ़ है। भू राजनीति भले ही अस्थिर हो, लेकिन ऊर्जा और जलवायु के मोर्चे पर दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ वापसी का रास्ता लगभग बंद हो चुका है। जीवाश्म ईंधन पर ज़ोर देने वाली राजनीति के बावजूद, डावोस में यह स्वीकार किया जा रहा है कि भविष्य बिजली का है। सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि संक्रमण होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि कौन कितनी तेज़ी से इसके साथ कदम मिला पाता है।
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ



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