बढ़ रही है डिजिटल हिंसा, लेकिन दुनिया की आधी महिलाओं के पास अब भी नहीं है कानूनी सुरक्षा

Digital violence against women: legal protection

  • Online harassment laws for women globally
  • Gender-based digital abuse statistics
  • Cyberstalking and deepfake threats to women
  • UN Women 16 days of activism digital safety
  • Legal gaps in online safety for women
  • AI-driven digital violence solutions
  • डिजिटल सुरक्षा में महिलाओं की कानूनी चुनौतियाँ
  • कैसे हो ऑनलाइन हिंसा से महिलाओं की रक्षा

डिजिटल दुनिया में महिला पत्रकारों पर बढ़ते खतरे

दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ डिजिटल हिंसा (Digital violence against women around the world) बढ़ रही है, फिर भी 1.8 अरब महिलाओं को कानूनी सुरक्षा का अभाव है। जोखिमों, संयुक्त राष्ट्र महिला अभियान और तत्काल वैश्विक सुधारों पर विचार करें। पढ़िए इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र समाचार की यह खबर.... 😨😨😨😨😨😨😨
Cyberstalking and deepfake threats to women
महिलाओं के लिए साइबरस्टॉकिंग और डीपफेक खतरे

डिजिटल माध्यमों का फैलता दायरा विश्व भर में लोगों व समुदायों को आपस में जोड़ने और उनके सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण वादा है, मगर करोड़ों महिलाओं व लड़कियों के लिए यह एक ऐसी दुनिया भी है, जहाँ उन्हें निरन्तर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है. कृत्रिम बुद्धिमता (एआई), गुमनामी, क़ानूनों व जवाबदेही की कमी की वजह से महिलाओं के विरुद्ध डिजिटल हिंसा चिन्ताजनक गति से फैल रही है, लेकिन 1.8 अरब महिलाओं व लड़कियों, यानि उनकी आधी आबादी के पास क़ानूनी संरक्षण नहीं है.
इसके मद्देनज़र, महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) ने 16 दिनों तक चलने वाली अपनी सामाजिक सक्रियता मुहिम के ज़रिए मांग की है कि डिजिटल जगत में टैक्नॉलॉजी के ज़रिए महिलाओं को नुक़सान पहुँचने के बजाय उनके लिए समानता को बढ़ावा मिलना चाहिए.
डिजिटल हिंसा की ये घटनाएँ, इन्टरनैट जगत के हर कोने में नज़र आती हैं – ऑनलाइन उत्पीड़न से लेकर सोशल मीडिया पर पीछे पड़ जाने या बार-बार सन्देश भेजने (‘साइबर स्टॉकिंग’), निजी जानकारी को सार्वजनिक कर देने, बिना सहमति के तस्वीरों को साझा करने, वास्तविक नज़र आने वाली झूठी तस्वीरों का इस्तेमाल करने (डीपफ़ेक), और जानबूझकर भ्रामक जानकारी को फैलाने.
यूएन संस्था के अनुसार, इन सभी तौर-तरीक़ों को हथियार बनाकर, महिलाओं व लड़कियों की आवाज़ दबाने, उन्हें शर्मिन्दा करने और डराने-धमकाने की कोशिशें हो रही हैं.

क़ानूनी उपायों का अभाव

विश्व बैन्क के आँकड़ों के अनुसार, महिलाओं की साइबर उत्पीड़न या ‘साइबर स्टॉकिंग’ से रक्षा करने के लिए 40 फ़ीसदी से भी कम देशों में क़ानून हैं.
इस वजह से, विश्व भर में महिलाओं व लड़कियों की 44 फ़ीसदी आबादी (1.8 अरब) के पास क़ानूनी संरक्षण उपलब्ध नहीं है.


नेतृत्व पदों, व्यवसाय या फिर राजनैतिक जगत में महिलाओं को ‘डीपफ़ेक’, उत्पीड़न और लिंग-आधारित दुष्प्रचार से जूझना पड़ता है, जिसका मक़सद अक्सर उन्हें सार्वजनिक जीवन या फिर किसी डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म को छोड़ने के लिए मजबूर करना होता है.
एक अनुमान के अनुसार, विश्व भर में हर चार में से एक महिला पत्रकार ने जान से मार दिए जाने समेत शारीरिक हिंसा की ऑनलाइन धमकियाँ मिलने की जानकारी दी है.
यूएन वीमैन की कार्यकारी निदेशक सीमा बहाउस ने कहा कि जो कुछ भी ऑनलाइन माध्यमों पर शुरू होता है, वो वहीं तक सीमित नहीं रहता. डिजिटल दुर्व्यवहार अक्सर वास्तविक जीवन में फैल जाता है, जिससे भय फैलता है, आवाज़ें चुप हो जाती है और कुछ मामलों में यह शारीरिक हिंसा या फिर स्त्री होने की वजह से हत्या (Femicide) कर दिए जाने की वजह बन सकता है.
इसके मद्देनज़र, उन्होंने कहा कि टैक्नॉलॉजी के साथ क़ानून में भी बदलाव किया जाना होगा, ताकि ऑनलाइन व ऑफ़लाइन माध्यमों पर महिलाओं की रक्षा की जा सके.

समानता को बढ़ावा मिले

ऑनलाइन दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाओं के मामले की जानकारी कम ही सामने आ पाती है. ऐसे मामलों के लिए न्यायिक व्यवस्था फ़िलहाल पूरी तरह सक्षम नहीं है, और टैक्नॉलॉजी प्लैटफ़ॉर्म द्वारा पूरी तरह से जवाबदेही तय नहीं हो पाती है.
एआई माध्यमों का भी दुर्व्यवहार के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और दंडमुक्ति की भावना को बल मिला है. हालांकि, सुधार के संकेत भी नज़र आ रहे हैं.
सीमा बहाउस के अनुसार, “16 दिनों की सामाजिक सक्रियता मुहिम के ज़रिए, यूएन वीमैन ने एक ऐसी दुनिया की पुकार लगाई है जहाँ टैक्नॉलॉजी से समानता को बल मिले, यह नुक़सान की वजह न बने.”
टैक्नॉलॉजी से उपज रही इन चुनौतियों पर पार पाने के लिए ब्रिटेन, मैक्सिको, और ऑस्ट्रेलिया समेत अन्य देशों में ऑनलाइन, डिजिटल सुरक्षा क़ानून बनाए गए हैं.
वर्ष 2025 तक, 117 देशों ने डिजिटल हिंसा से निपटने के लिए अपने प्रयासों से अवगत कराया है, हालांकि पार-राष्ट्रीय समस्या होने की वजह से यह चुनौती बरक़रार है.
इसके मद्देनज़र, यूएन वीमैन ने निम्न क़दम उठाए जाने का आग्रह किया है:
  1. डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म व एआई टूल्स के सुरक्षा व नैतिक मानकों पर खरा उतरने के लिए वैश्विक सहयोग
  2. डिजिटल हिंसा के भुक्तभोगियों को समर्थन देने के लिए महिला अधिकार संगठनों को वित्तीय समर्थन
  3. बेहतर क़ानूनों के ज़रिए दोषियों की जवाबदेही
  4. ऑनलाइन प्लैटफ़ॉर्म को सुरक्षित बनाने के लिए टैक्नॉलॉजी कम्पनियों द्वारा पुख़्ता प्रयास
  5. डिजिटल साक्षरता व ऑनलाइन सुरक्षा प्रशिक्षण के ज़रिए रोकथाम उपायों व सांस्कृतिक बदलाव में निवेश

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Amalendu Upadhyaya
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।

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